ऐ गीत मेरे मन के
तूं बन जा इक चिंगारी
कि मैं बन जाऊं
आज फलक की शोभा न्यारी
आज मेरा अंतरमन
कर मुझ से उद्घोष रहा
पता नहीं क्या बैर है मुझसे
जो मुझको झकझोर रहा
कर ले इससे प्यार से बातें
कर ले इससे यारी
ऐ गीत मेरे मन के
तूँ बन जा इक चिंगारी
मैं बन जाऊँ, आज फलक की शोभा न्यारी
बड़ा हिमालय सा समाज
प्रतियोगी बन खड़ा है काल
इसमें प्रतिद्वन्दी बन
मैं भी कर लूँ हिस्सेदारी
ऐ गीत मेरे मन के
तूँ बन जा इक चिंगारी
मैं बन जाऊँ
आज फलक की शोभा न्यारी
– रचना मिश्रा
आज की सुबहआज की सुबह अनकही अनजानी सी कहानी कह गयी!
ये जुबां न जाने कैसी कहानी कह गयी!
आज की सुबह ने महसूस कराया के मैं क्या हूँ !!
मेरे वजूद से मुझे मिलाकर,
न जाने खुद कहाँ खो गयी !!
मैं हूँ तो छोटी पर मुझे कुछ बड़ा करना है !
अपने माता पिताजी के सपनों को साकार करना है !!
ज़िन्दगी जीना आज से पहले लगता था जो मुश्किल,
आज माँ पिताजी के आशिर्वाद से आसान सा लगता है!
सांसारिक मोह माया में खो गया था मेरा वजूद कहीं!
आज मुझे वो मेरे ही पास और मेरा सा लगता है !!
ये ज़िन्दगी बड़ी खुशनसीबी से मिली है मुझे ,
इसे आज उसी ख़ुशी के साथ जीने का दिल करता है!
अपनी ज़िन्दगी को तो खुशियाल बना लूँ पर,
पर आज अपने साथ साथ …
दूसरों को भी खुश करने का दिल कर रहा है !!
आज बड़ी ही चंचलता है मेरे मन में ,
कुछ पागलपन सा करने का मन कर रहा है !!
झूमने, गाने, और पंछी बन,
खुले आसमान में उड़ जाने को मन कर रहा है !
भले ही कितने भी मुश्किल पड़ाव आएं इस ज़िन्दगी में ,
पर आज उन्हें गम का नाम ना देकर,
खुशियों से सुलझाने का मन कर रहा है !!
– आँचल वर्मा



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